Today

Ek baar Phir se Aap sabhi ko Nirala ji ke janam din ki hardik badhayi 

Aur Basant panchi ki Shubhakamnaye 

Basant ki baat Ho to prem per kuch keh a banta hai. 


Navchetan ki taraf se is amanataran ke liye dhanyawaad 

Namaste alka ji, Neelam ji, Aur naresh ji, Aur Shaifali ji 





महफ़िल में यारों की जब जब, चर्चा अपना जो आएगा 

जब नाम सुनेगे मेरा सब, तुझको भी पूछा जायेगा 


भूली बिसरी उन यादों का, किस्सा दोहराया जाएगा 

टूटा टूटा दिल मेरा तब, टुकड़े टुकड़े हो जायेगा 


————-/—


प्यार के बोल का प्यार ही मोल है

प्यार को तोल न प्यार अनमोल है
प्यार निशब्द है, प्यार ही गूंज है
प्यार की है जो भाषा वही मौन है
———///////

आज गयी थी उसी झील पे , हम  तुम पहली बार मिले थे
तेरे प्रथम प्रणय निवेदन से , सपनो के संसार सजे थे
आसमान खुशियों से रोया, और ज़मीं कुछ पिंघळी सी थी
लहरों सी उठती गिरती वो एक घटा कुछ उमड़ीं सी थी
और कनेरी घूप बिछि थी सेज हमारी बनने को
चिड़ियों की बोली लगती थी शहनाई सी बजने को

आज वहां पर वीरानी थी तन्हाई सी छायी थी
बरखा जैसे चली गयी थी ऋतू पतझड़ की आयीं थी
गिरते थे मुरझा मुरझा कर  अपनी उन यादो  के पत्ते
कैसे उड़ने देती उनको प्यार भरे वो खत तेरे थे
सूखे थे बिलकुल अंदर तक आग पकड़ली जल्दी से
जल के अब बुझ ही जायेंगे टुकड़े ये मेरे दिल के

राख बनीं उन यादों को भी हवा ले गयी संग अपने
और बचे अवशेष भी अब तो मिल जायेंगे  मिट्टी में
आओगे जब भी तुम ऐसे इस झील के कोने पे
मुठ्ठी में लेना तुम मिट्टी और गिरना पानी में
सपने मेरे दिख जायेंगे तुम्हे झील आईने में
और दफ़न हो जायेंगे वो इसी झील के पानी में


————
घर की छत
सर्दी की दोपहर
पास में रेडियो
पुराने कुछ गाने
टूटी सी एक  खाट
मूंगफली के दाने


दौड़ती गिलहरियाँ
दाने कुतरती
गेंहूं धुले हुए
छत  पे थे सूखते
चहकती गौरैया
दाने बटोरती

बदन तो चीरती
होती महसूस ये
सूरज की गर्म गर्म
नर्म सी धूप ये
ठिठुरे से हाथो को
करती हैं गर्म ये

पड़ोसी के घर सेआती 
चूल्हे की ये लहक
पराठों की खुशबु मिली
मक्खन की हैं महक

सामने की छत पे
धुप देने के लिए
रक्खे कुछ रंगीन
अचारों के डब्बे

साथ फैली चादर पे
सूखते ये पापड़
खट्टा नमकीन ये
रस मुँह में हैं घोलते


दूर कही दूसरी
एक और छत पे
पतंगे उड़ाते
कुछ छोटे से लड़के

आसमा में झांक के
पतंगों को देखना
मुश्किल करे बड़ा
ये सूरज चमकता 


ये ही वो लम्हे हैं
मैं सोचने जो बैठू 
लगता है आज  भी
हूँ उस ही उम्र में
सर्दी की दोपहर में
घर की उस छत पे


बिलकुल हैं ताज़ा
ये मेरे जहन में
क्योकि ये ही वो पल थे
जो मैंने जिए थे…जो  मैंने जिए थे
बाकि तो सब बस
कट सा रहें है
ये ही वो पल थे
जो मैंने जिए थे… मैंने जिए थे



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