Posts

Showing posts with the label Muktak

ठहरना ही भूल गयी

हर हुनर सिख के उतरी थी मई इस दौड़ मैं मगर जीत के निकली तो जाना की मैं ठहरना ही भूल गयी

सौदेबाज़ी

सौदेबाज़ी का एक हुनर मैंने माँ से सीखा मैं एक रोटी मना करती वो दो पे अड़ जाती मैं पहले ना करती फिर एक पे मान जाती इस तरह हर बार वो अपनी बात मनवा लेती 

प्यार और जिद

जिद न कर साथ निभाने की साथ जीने और साथ मरने की इस जिद ने ही उन्हें लैला मजनू बना दिया वार्ना क्या कृष्ण राधा ने प्यार नहीं किया?

इंतजार

इंतजार का मज़ा तो तब हुआ करता था जब जमाना चिठ्ठियों का हुआ करता था एक ही चिठ्ठी कई कई बार पढ़ा करतें थे अलफ़ाज़ वही हर बार, एहसास नए लगते थे 

राते

मोहब्बत  में नहीं होती हमेशा एक सी राते कभी बहार है बरसाते, कभी अंदर है बरसाते तेरे आगोश में गुजारी न जाने कितनी ही रातें अब तेरे ही ख्वाब पे हॅसते, है तेरे ख्वाब पे रोते
Image
अरे जनाब।।।हम उनके प्यार पे नहीं एतबार पे मरते हैं धड़कने रुक जाती हैं जब वो तस्सली से मेरे कंधे पे सर रखते हैं 

अनकही बातें

वो अनकही बातें, अनकही ही रहें तो बेहतर  वो शब्द जो निकलें और शून्य में खो जाएँ  किसी के दिलोँ दिमाग़ में आश्रय ना पाएं  उनका आशियाँ मेरा दिल ही रहे तो बेहतर  वो अनकही बाते, अनकही ही रहें तो बेहतर  वो बहस  जिसका कभी अंत न हो  अंत ही भी तो परस्पर सहमति न हो  उसपर तर्क रखने से तो चुप रहना बेहतर  वो अनकही बाते, अनकही ही रहें तो बेहतर   वो जो हो कर भी यहाँ  कुछ न बदले  वो जिसका जाना भी यहाँ कुछ न बदले  ऐसे अस्तित्वहीन आकर से तो निराकार बेहतर  वो अनकही बाते, अनकही ही रहें तो बेहतर  वो रिश्ते जो दिल  तोड़ दें और दर्द दें,   धागे मन जोड़ने की जगह बाँध दें   उन धागों का टूट जाना ही बेहतर  वो अनकही बाते, अनकही ही रहें तो बेहतर  मेरी उदास आंखे भी जो तू पढ़ न सके   मुस्कराहट में छिपे मेरे आंसू जो तुझे न दिखे  ऐसे बहते आंसुओं को तो पी जाना बेहतर  वो अनकही बाते, अनकही ही रहें तो बेहतर 
कौन कहता है की जिनके पर नहीं होते उनके आसमानो में कहीं घर नहीं होते उड़ाने परिंदो की नहीं इरादों की मशहूर हुई हैं कैसे उड़ता इंसान हवाओं में गर हौसले इसके बुलंद नहीं होते