अशोक
हर तरफ नर मुंड थे
हर तरफ चितकार थी
खून से लठपथ था सब
इंसानियत बेज़ार थी
यत्र तत्र बिखरे थे अंग
देह पड़ी बेहाल थी
डूबते सूर्य सी देखो
ये धारा भी लाल थी
धूल भी उड़ती थी लाल
गंध रक्त की लिए
थे बुझे रण भूमि में
जलते हुए कितने दिए
जीत की खबर घरो में
लाश संग थी आ रही
मौत का ये जश्न था
और जिंदगी घबरा रही
देख कर ये दृश्य सारा
हार भूला जीत भूला
सोच में बैठा हुआ था
पाया क्या और क्या हैं खोया
आँख में अश्रु भरे थे
संताप से मन था ये व्याकुल
युद्ध का परिणम था ये
क्या जमा क्या शेष था कुल
युद्ध बस एक युद्ध है
ये हार है ना जीत है
अंत में कुछ भी न हासिल
युद्ध की यही रीत है
विध्वंस सारा देख कर ये
कर लिया संकल्प ये
देना है इस विश्व को अब
प्यार का संदेश ये
चल पड़ा उस पथ पे वो
अहिंसा का जो मार्ग था
आज समझा था ये उसने
जो सत्य का सं ज्ञान था
मन परिवर्तन हुआ था
एक बड़े सम्राट का
जो लड़ा ये युद्ध कलिंगा
सबब था जो विनाश का
बुध की शिक्षऐ ले
मन में ये निर्णय लिया
मानवता को शेष जीवन
उसने फिर अर्पण किया
~ kavita nidhi
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