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Double standard

आज घर में काम बहुत है,आज ऑफिस मत जाना जाओगी भी तो सुनो,थोड़ा देर से जाना देखो किसी भी तरह मैनेज करो,घर की जिम्मेदारी है मम्मी पापा आ रहे हैं,ठीक से निभानी है पति ऑफिस निकल जाता है, और काम में व्यस्त हो जाता है ऑफिस में अपनी देर से आने वाली  सहकर्मी पर ख़ूब चिल्लाता है, ये सब बहाने यहां नहीं चलेंगे, ऐसा उसे समझा है फ़िर लंच टेबल पर जब वही सहकर्मी का ज़िक्र आता है, “ये औरते कुछ काम की नहीं होती”, अपनी frustration दोस्त को सुनाता    है  किस तरह वो बिन बताये छुट्टियाँ करती हैं,और कभी यूँ ही लेट आती है, इस पर भी चर्चा करता है वही आज पत्नी के ऑफिस में एक ऐसी ही चर्चा जारी है  पात्र अलग है पर नज़रिया वही है,औरतों का ये संघर्ष हर जगह जारी है.

पान का बीड़ा

बड़े प्यार से लपेट कर बातों को ऐसे परोसते हैं  जैसे पान का बीड़ा बाँध रहें हो।  और हम भी खामोशी से सर हिलाकर यू मुस्कुराते हैं  जैसे मुँह में वही पान    चाब रहें हो।  बड़े इत्मिनान से लगा रहे हो चुना कत्था,  तुम सुपारी    तो ऐसे काटते हो प्यार से,  जैसे गोया हमारा उल्लू काट रहे हो बहुत ना सही पर थोड़े समझदार  हम भी हो गए हैं  अब,  पान खा के सुपारी थूक देतें हैं.  जानते हैं ये पान तुम यूँ ही  फ्री क्यों बाँट   रहे हो।

जा रही हूं।

जा रही हूं मेरी याद आये तो ढूंढ लेना  मुझे,  वहीँ… लव स्टोरी की किताब के पन्नो के  बीच  रक्खे उस पुराने गुलाब की खुशबू में तुम्हारी अलमीरा की ड्रॉर में  पड़े उस टूटे हुए झुमके में  माथे से उतार, आईने पर लगायी  उस लाल काली बिंदी में  चांद पे ठहरे  हुए काले बदल में  बारिश की टपकती हुई बूंदो में बाइक पर तुम्हारे कंधो पे कभी  रक्खे हुए हाथो के एहसास में बालो को सहलाते हुए हवा के झोको में पीले फूलो पे मँडराती तितली में और ढूंढ  लेना मुझे  गोवा के बीच पर पानी की कल कल आवाज में टूटे पत्ते की चाल में दूर कहीं से आते बच्चों की हँसने की आवाज़ में स्टेशन पे गाड़ी के लिए रुकी उन आंखों के इंतजार में बारिश की शाम के बाद गीली सड़को पे पड़ती  लाइट की झिलमिलहाट  में और जब जाओगे अकेले दूर शहर से  ढूंढ लेना मुझे सड़क की सुनसान में  थक के लेटोगे कभी तोखुद की  धड़कनो की आवाज में और कभी मूवी हॉल में यूँ  ही  मिल जाऊंगी तुम्हें किसी किरदार में  पर अब जाना है, तो जा रही हूँ  याद आ...

रात कचहरी

रात कचहरी बैठी थी तारे सब सुनने आये  चंदा पे इल्जाम है ये कि याद तेरी ये ले आये  दिल में दर्द उठता है ये बड़ा मुझे तड़पता है  नींद मेरी ये चोरी करके  बादल में छुप जाता है हँसता है माशूक सा ये  और कभी  मुस्कुराता है  थोड़ा सा ये छेड़ छाड़ कर पूनम सा खिल जाता है  रात ने सब सुनवायी की तब बादल की भी गवाही  ली तब नींद को भी कटघरे खड़ा कर पेशी उसकी लगयी थी तब चांद का रंग था उड़ हुआ  पर बात पे अपनी अड़ा हुआ बोला मेरी सूरत ऐसी  क्या ये भी मेरा गुनाह हुआ चांद ने फिर की अपील कई  हैं पास    मेरे  न वकील कोई इल्जाम से बचने की भी क्या  इस दिल के पास, है डील कोई  सबकी सुन, जज, रात ने अब दे दिया फ़ैसला ऐसा कुछ गर रात में चन्दा आएगा   निकलेगा ये घूंघट में छुप  तब से चंदा आता तो है  नींदे भी मेरी ये  उड़ाता  हैं  पर केवल पूनम के ही दिन  सूरत ये पूरी दिखाता है   आज तलक भी सजा काटता  घूंघट में से जरा झांकता   और अमावस में  तो चंदा  छुप कर ही  है रात काटता...

Coffee Aur Tum

 पहले २ घूँट अजीब लगे थे  थोड़े से कड़वे  फिर अगले २ पहले से बेहतर  बिलकुल तुमसे  और फिर दिन पर दिन हर एक कप के साथ  मुझे ये कॉफ़ी अच्छी लगने लगी  और अब कॉफ़ी आदत में शुमार है  तुम्हारी तरह  तुम्हारे साथ एक कप कॉफी  और थोड़ी खामोश सी बातें  जन्नत है   तन्हाई में भी तुम्हारी याद और बस एक कप कॉफ़ी   काफी है  हर दिन banconey में बैठ ये जो साथ में  कॉफ़ी पीते हैं हम   यही ज़िन्दगी है 

हद से आगे

ख़ुद को मैंने बदल कर भी देखा तेरे आइने मे उतर कर भी देखा मुझमें मैं को मिटा कर के मैने सनम तुझसा खुद को बनाकर भी देखा प्यार की एक झलक को आँखों में तेरी अपना वजूद, फ़ना करके भी देखा मिटने से पहले तड़पना था बाकी अश्क को एक नामी को तरसते भी देखा जिस्म को दर्द होता नहीं आजकल दर्द में रूह को अब सिसकते है देखा क्या और हारूँ जो तुझको मैं पा लूँ  क्या कुछ नहीं आजमा के है देखा बेवफ़ाई नहीं उनकी फ़ितरत में लेकिन वफ़ा मैंने उनको सिखा के भी  देखा प्यार आता नहीं उनको करना किसी से मैंने भी  सोचो, कि क्या उनमे देखा ~kavitaNidhi प्यार लौटा है मेरा टकराके जख्मी सीने में दिल उनके पत्थर का देखा चाहती हूं सख्त उनसा करलूं  मैं खुद को मगर मोम सा दिल पिंघलते है देखा नहीं था ये आसान हदे पार करना हदो    से भी आगे निकल कर है देखा ख़ुद को यू मैंने बदल कर भी देखा आइने मे तेरे यूँ  उतर कर भी देखा...

Kahani- vo sawali si ladki.

  आज सोचा कि कुछ लिखा जाएगा. कहानी लिखने का मन बना पर सोच रही हूं कि क्या लिखूं। वैसी कहानी है क्या? कुछ घटाएं जो आपके मन  को प्रेरित कर सके या आपके जीवन को प्रेरित करे। पर ये घाटनाये कहानी नहीं है. बाल्की उनको अपनी नजरों से देख कर लिखना कहानी है। और अगर आपका नजरिया पढ़ने वाला समझ  जाए और महसूस कर पाए तो आपकी कहानी सार्थक है। और अगर ये कहानी किसी की जिंदगी में प्रेरणा बन जाए तो ये कहानी अमर है। चलिए ये तो कहानी की बात हो गई...पर कौन सी ऐसी घटना थी  मेरे जीवन की जिस पर मैं  कहानी लिख सकती हूँ । तो बात उन दिनों की है जब मैं कक्षा ६  में थी।  मेरे पापा  एक बैंक में नौकरी करते थे  और उनका हर ३-४ साल में स्थानांतरण (तबादला होता रहता था। हमने  अभी अभी इस नए शहर में शिफ्ट किया था और नवंबर का महीना होने के कारण मेरा स्कूल में लेट एडमिशन था  हाफ इयरली नजदीक थे और मुझे बहुत सारा काम पूरा करना था। टीचर ने फर्स्ट डे, क्लास की टोपर रीना भारती  से मेरी मित्रता करा दी और उसे मेरी सहायता करने के लिए कहा।   वो एक दुबली पतली सवाली सी लड़की थ...