Double standard

आज घर में काम बहुत है,आज ऑफिस मत जाना

जाओगी भी तो सुनो,थोड़ा देर से जाना

देखो किसी भी तरह मैनेज करो,घर की जिम्मेदारी है

मम्मी पापा आ रहे हैं,ठीक से निभानी है


पति ऑफिस निकल जाता है, और काम में व्यस्त हो जाता है

ऑफिस में अपनी देर से आने वाली 

सहकर्मी पर ख़ूब चिल्लाता है, ये सब बहाने यहां नहीं चलेंगे, ऐसा उसे समझा है


फ़िर लंच टेबल पर जब वही सहकर्मी का ज़िक्र आता है,

“ये औरते कुछ काम की नहीं होती”, अपनी frustration दोस्त को सुनाता  है 

किस तरह वो बिन बताये छुट्टियाँ करती हैं,और कभी यूँ ही लेट आती है, इस पर भी चर्चा करता है


वही आज पत्नी के ऑफिस में एक ऐसी ही चर्चा जारी है 

पात्र अलग है पर नज़रिया वही है,औरतों का ये संघर्ष हर जगह जारी है.

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