रात कचहरी

रात कचहरी बैठी थी

तारे सब सुनने आये 

चंदा पे इल्जाम है ये

कि याद तेरी ये ले आये 


दिल में दर्द उठता है ये

बड़ा मुझे तड़पता है 

नींद मेरी ये चोरी करके 

बादल में छुप जाता है


हँसता है माशूक सा ये 

और कभी  मुस्कुराता है 

थोड़ा सा ये छेड़ छाड़ कर

पूनम सा खिल जाता है 


रात ने सब सुनवायी की तब

बादल की भी गवाही  ली तब

नींद को भी कटघरे खड़ा कर

पेशी उसकी लगयी थी तब


चांद का रंग था उड़ हुआ 

पर बात पे अपनी अड़ा हुआ

बोला मेरी सूरत ऐसी 

क्या ये भी मेरा गुनाह हुआ


चांद ने फिर की अपील कई 

हैं पास  मेरे  न वकील कोई

इल्जाम से बचने की भी क्या 

इस दिल के पास, है डील कोई 


सबकी सुन, जज, रात ने अब

दे दिया फ़ैसला ऐसा कुछ

गर रात में चन्दा आएगा  

निकलेगा ये घूंघट में छुप 


तब से चंदा आता तो है 

नींदे भी मेरी ये  उड़ाता  हैं 

पर केवल पूनम के ही दिन 

सूरत ये पूरी दिखाता है  


आज तलक भी सजा काटता 

घूंघट में से जरा झांकता  

और अमावस में  तो चंदा 

छुप कर ही  है रात काटता 


पर दिखता अब भी तुझसा यारा 

आधा लगे ये और भी प्यारा 

हल्की हल्की इसकी ये झलक 

है दर्द  उठाती बहुत ही  सारा 


सजा तो जैसे मुझे मिली है 

तारे गिन गिन रात कटी है 

विरहा में दिल तड़प रहा ये 

आँखों की भी नींद उड़ी  है 


रात कचहरी बैठी तो थी

सब तारे थे  सुनने आये 

इल्जाम तो था इस चंदा पर 

फिर सजा मेरा ये दिल क्यों पाए 


——————-






Comments

Popular posts from this blog

मन मेरा बेचैन है

Kavita- मैं राम लिखूंगी

चाय