मन मेरा बेचैन है, या ऋतुओ का फेर है। ठण्डी सी हवाए क्यों लगती है वज्र सी, लेती इम्तेहान मेरा हर घड़ी सब्र की। हर लम्हा रुक गया है, बैठा है पास मे, आयेंगे पिया मेरे, है ऐसी ही आस मे। इतना समझाया इसे, आभी कुछ तो देर है , मन मेरा बेचैन है, या ऋतुओं का फेर है। बारिश की बूंदे यूँ, मन को छू रही है क्यों, बैठी हूँ दूर फिर भी तन भिगो रही है क्यों। पत्तों की सरसराहट हर तरफ है गूंजती, कदमो की हर आहात, कानो से पूंछती। दृश्य मैं हो तुम ही तुम, ये आँखों का हेर है, मन मेरा बेचैन है या ऋतुओं का फेर है। आभी तक महसूसती हूँ उंगलियों की छाप जो, पिंघल के कुछ उड़ गया है, तन मेरा है भाप जो। कमरे के कोने में चादर को ओढ़ के , बैठी समेट के और पैरों को मोड़ के। सन्नाटा छाया है, ख्वाबों का घेर है , मन मेरा बेचैन है या ऋतुओं का फेर है।
Gullu मेरे एहसास को तुम गीत में अलफ़ाज़ दे देना मैं जाऊं दूर तो तुम रोक कर आवाज़ दे देना इन्ही मुश्किल से रास्तो पे जो खो जाऊं मैं एक दिन तो पता तुम याद रखना मंजिलो का साथ दे देना कटे दिन धूप में चाहे बड़ी मुश्किल से मेरा पर मैं जिसमे चैन से सोऊँ बस ऐसी रात दे देना मेरा दिल प्यास से तड़पा बहुत है अब तलक सागर मैं जिसमे डूब के नाचू वो तुम बरसात दे देना Mai lad bhi jaoongi Tere liye ab is jamane se मेरे हाथो में बस तुम आज अपना हाथ दे देना Mujhe yu to mili hai har taraf tareef logo se मगर ख्वाइश है थोड़े प्यार की तुम प्यार दे देना बहारे तो बहुत सी आके गुजरी हैं ये गुलशन से गुजरना तुम मगर यूँ ज़िन्दगी गुलज़ार कर देना बड़ी बेचैन सी आँखे है ...
जीवन को रोशन करे, उगते सूरज की लाली। ज्ञान गगरिया गुरु की, कभी न होती खाली।। मन मस्तिष्क भटका रही, भयवाह रात ये काली। बने दीप पथ दर्शाये, गुरु देव की वाणी ।। सदा उत्साह वर्धन करे, दें कभी दंड कभी ताली। कहाँ सही कहाँ गलत है, समझ बूझ दे सारी ।। सींच सींच कर हरा करे, ज्यों मन उपवन को माली। गुरुदेव की शिक्षाएं, हैं अमृत रस की प्याली ।। चरणों में मैं नमन करूँ, हो नतमस्तक मुद्रा धारी। देवों से पहले सदैव, हो गुरुजानो की बारी ।।
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