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कमियां

 अभी भी कमियां हैं बहुत, उन्हें संवार रही हूं  आपके दिए सुझाव, कविता में उतार रही हूं बस लिख रही हूं जो दिल कह रहा है लिखने को आप बीते कुछ किस्से कलम से उभार रही हूं  आपके दिल तलक पहुँचे तो मुकम्मल है जिंदगी वर्ना तो यूँ समझो कि बस इसे गुजार रही हूं

इत्र की खुशबू सी मैं

  इत्र की खुशबू सी मैं इत्र की खुशबू सी बिखर के निकली हूँ  अवतार में एक नए उतर के निकली हूं  सुनो उतार लो मेरी ये नज़र अब तुम  उसके इश्क में जरा संवर के निकली हूं अब तो दिखती हूं मैं दिलकश जो बहुत उसकी    निगाहों    से निखर के निकली हूँ  तीखी ये निगाहें यू ही नहीं मेरी रंग श्याम का आंख में भर के निकली हूं  क्यों ना करू नाज़ अदाओं पे अपनी  तुझसे सौ आशिक कत्ल कर के निकली हूँ।  दीवानी हुई अब उसकी मोहब्बत में  आशिको की बस्ती से डर के निकली हूं  बेहिसाब धड़कता है दिल मेरा    निधि लंबी सांस ले जरा ठहर के निकली हूं  ~KavitaNidhi 

एक किनारा चाहिए

डूबती नैया को यारो, एक किनारा चाहिए  स्याह काली रात को बस एक सितारा चाहिए  दुनिया की इस भीड़ में मैं खो गया हूँ इस कदर  खुद को मैं फिर ढूंढ लूँगा संग तुम्हारा चाहिए  मानता हूँ आज मेरे,  और ही हालात हैं  लड़खड़ाया हूँ जरा बस एक सहारा चाहिए  लड़ रहा हूँ  हर कदम ,जो बांध के सर पे कफ़न  जीत का मुझको भी अब  तो सर पे सेहरा चाहिए   जीने का कुछ तो मिले मुझको बहाना ज़िन्दगी  मुझको टूटा स्वप्न मेरा फिर दोबारा चाहिए  राहों में भटका बहुत हूँ  हो पसीना तर ब तर  बस निधि अब मंज़िलों का एक नजारा चाहिए  —— राहे मंजिल ढूंढ़ता  हूँ, हो  पसीना तर ब तर  दो घडी मैं सांस ले लूं वो ठिकाना चाहिए  ——

तूफ़ान उठना चाहिए

सीने की इस आग से सूरज पिंघलना चाहिए दिल में जज़्बा है अगर तूफ़ान उठना चाहिए चिंगारियों से अब सुनो,  होगा कुछ हासिल नहीं जोश का इस दिल में अब शोला भड़कना चाहिंए रात काली इतनी लम्बी चाँद भी डूबा लगे रातों को अब चीर कर सूरज निकलना चाहिए  और कितनी है सजा अब, ये बता मुझको खुदा  इंसान तो इंसान है, तुझको समझना चाहिए सौ दिशा में दौड़ें जो, भीड़ से हो जायेंगे है जीतना, तो हर कदम, साथ  उठना चाहियें  क्रोध भी अब कब तलक, यूँ धैर्य का पर्वत रहे बन के एक ज्वालामुखी, लावा निकलना चाहिए इस पवन के कान में  तू , फूक दे कुछ यूँ निधि  आसमा आल्हाद से फिर , गूंज उठना चाहिए  —————Ok 

इश्क़ होना चाहिए

  ————- इश्क़ की गलियों में दिल बदनाम  होना  चाहिए आशिक़ो में अब तो मेरा नाम होना चाहिए  प्यार के एहसास का बस इस तरह इज़हार हो कुछ  कहो या न कहो, महसूस होना चाहिए जान भी देदूं मैं अपनी आशिकी में अब सनम इश्क़ में मजनू सा एक, महबूब होना चाहिए तेरी  ख़ुशी के वास्ते, हैं ज़ख्म कितने ये लियें अश्क़ तो पिलएंगे हम, तू खुश भी  होना  चाहिए मैं लुटादूँ  तुझपे अपनी ज़िन्दगी की हर ख़ुशी चहरे सा मासूम तेरा दिल भी होना चाहिए है नहीं काफी ये कहना, इश्क़ हमको है बहुत हैं अगर जज़्बात दिल में, दर्द होना चाहिए  प्यार में तड़पन है कितनी, तुम न समझोगे अभी  मुझसा ही अब, तुझको मुझसे इश्क़ होना चाहिए  क्या करोगी इश्क़ की उस आग में जल के निधि  उसको भी तो वो जमाना याद होना चाहिए  ————-

दिल के जज़्बात

मेरे दिलऐ जज़्बात   बड़ी मुश्किल से बिठाये  हैं  बहर में  , मेरे दिलऐ जज़्बात  जाते हैं  बाहेर फिर भी  निकल  ये, मेरे दिलऐ जज़्बात    वैसे भी ये शर्ते कहाँ मानी कभी जामने की इसने   अपने ही दिल के तो मालिक है ये, मेरे  दिलऐ जज़्बात  थोड़े  उन्मुक्त  से हैं ये, बड़े उद्दंड और  उच्छंद  से हैं बिना किसी छंद निकल आते हैं ये, मेरे  दिलऐ जज़्बात  कितना समझाया इन्हे , काफिया में रहें,  ये रदीफ कहें  सुन बगावत पे उतर आते हैं ये, मेरे  दिलऐ जज़्बात  लिखते हम भी, कुछ तो शायरी,  कोई अच्छी सी गजल  गर सलीके से निकलते जरा ये, मेरे  दिलऐ जज़्बात  मैंने तो सोच लिया था मेरा एक  तख़ल्लुस  भी निधि  आके मक़्ते पे यूँ बिखरते न जो   ये, मेरे  दिलऐ जज़्बात  ~kavitaNidhi ——/////

पुरानी हूं मैं

पुरानी हूं मैं  बस एक लहर नहीं  हूं मैं ,  मौजो की रवानी हूं मैं  छोटा सा वाकया नहीं,एक पूरी कहानी हूं मैं  जितना जानते हो मुझे, बस उतना काफी नहीं  है  जितनी दिखती हूँ  उससे, थोड़ा ज्यादा स्यानी हूँ मैं  चार पन्ने पढ़ किताब के, भला कैसे समझ लोगे तुम?  रामायण,  महाभारत  पढ़ी है? वैसी, कोई पोथी पुरानी हूं मैं   वो सोचते है कि  उनसे,  प्यार  करती हूं मैं बहुत  नापोगे  तो जानोगे,  कि पूरी दीवानी हूं मैं ना चार दिन की चांदनी,और ना एक रात सुहानी  ज़िन्दगी का एक हिस्सा नहीं,  एक  पूरी ज़िंदगानी हूँ मैं  आजकल सा प्यार नहीं, कद्रदान हूं, निधि उस इश्क की   दिखती हूँ नई पर दिल से, कई पीढ़ी पुरानी हूं मैं ~KavitaNidhi ———-