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माँ से पहले मैं नारी हूँ

माँ से पहले मैं नारी हूँ मैं रही दिए की लौ बन कर  घर आंगन रोशन करती हूँ  मत खेलो मेरे जज़्बातों से  अंगार भी मैं बन सकती हूँ  मैं भड़क उठी जो अग्नि सी  ये गांव जला भी सकती हूँ  जो हवा तूफानी लाओगे  तो ख़ाक तुम्हे कर सकती हूँ  मंदिर में अपने रखते हो  पूजा भी मेरी करते हो  माँ कह कर आगे तुम मेरे  नत मस्तक अपना करते ही  हाँ वही मैं सीता मैया हूँ  हाँ वही मैं राधा रानी हूँ  हाँ वही मैं रक्षा करने वाली  माँ दुर्गा और भवानी हूँ  काली भी है अवतार मेरा  मैं रुद्र रूप धर  सकती हूँ  और याद रहे गर चाहूँ तो  मैं चंडी भी बन सकती हूँ  हर रूप में माँ स्वीकार है जब  मुझको भी तुम स्वीकार करो  माँ से पहले मैं नारी हूँ  हर नारी का सम्मान करो  माँ से पहले मैं नारी हूँ  हर नारी का सम्मान करो.......  ~Kavita nidhi

अभी और भी हैं

अभी   और   भी   हैं  ... ठोकरो   से   हो   न   विचलित   रास्ते   कई   और   भी   हैं   अफ़सोस  ( सोग)   ना   कर   हार   का   तू   मंज़िलें   अभी   और   भी   हैं   आस   का   एक   दीप   बुझता   सौ   दिए   नए   और   भी   हैं   न   मिला   जो   चाहा   था   पर   चाहतें   अभी   और   भी   हैं   एक   यही   बस   गम   नहीं   है   दर्द   कितने   और   भी   हैं   आज   उनका   साथ   छूटा   पर   सहारे   और   भी   है    प्यार   कितना   है   किया   पर   प्यार   मुझमे   और   भी   है   मर   मिटे   हम   उनपे   लेकिन   ज़िन्दगी   अभी   और   भी   है   तेरी   रूह   का ...

स्वतंत्रता दिवस

स्वतंत्रता दिवस मना रहे, दिल में वो मज़ा नहीं  जितना हमने चाहा था, देश आगे बढ़ा नहीं  माना प्रगति हो रही, दिशाए कुछ सही नहीं  माना उन्नति की हमने, रफ़्तार तेज हुई नहीं  आसमा को छु लिया, उड़ान भी ऊँची हुई  जमी पे कैसे रहना है, शऊर ये सीखा नहीं  दिल में प्यार है अभी, पर बात वो रही नहीं  लड़ते हैं हम आज भी, पर देश के खातिर नहीं  आतंकवाद बढ़ रहा है, कोशिशे नाकाम हुई  नेता से कुर्सी डरी, और बढ़ गयी है धांदली पूछो गरीब से है क्या, आज़ादी पता नहीं  स्थिति गरीब की, आज भी सुधरी नहीं  सपने जो भी देखे थे साकार वो हुए नहीं  संस्कृति इस देश की, जाने कहाँ पे खो गयी  फिर भी मेरे भारत सा, देश कोई दूजा नहीं  दुनिया हमने जो देखी, इंडिया प्यारी लगी 

नारी की व्यथा

वो   कभी   न   कह   पाऊंगी जो   अक्सर   सोचती   हूँ   पर   खुद   को   रोकती   हूँ   सबसे छुपाती हूँ  पर खुद से बोलती हूँ  चुप्पी तोड़ती हूँ  पर फिर सोचती हूँ  वो सब न कह पाऊंगी हक़ मेरा जो है आज  कभी लगता है मांग लूँ  डर जाती हूँ फिर  क्या टूटेगा ये आंक लूँ  हिम्मत जोड़ती हूँ  पर फिर सोचती हूँ  वो सब न मांग पाऊंगी  कितने गिले कितने शिक़वे  पन्नो पे लिखें कितनी रुसवाइयों के सिलसिले  मेरे मांझी पर पड़े कब इस दर्द के घनेरे से  खुद को निकाल पाऊंगी  पर फिर सोचती हूँ  ये कभी न कर पाऊंगी  जो सदियों से था  वो आज भी है  मेरा अस्तित्व गुमनाम था  जो आज भी है  जहाँ मैं रहती थी  वो आज भी है  जहाँ मैं रहती हूँ  वो आज भी हैं  पर किसी भी घर को  सोचती हूँ क्या अपना कह पाऊंगी  शायद ये न कह पाऊंगी  कभी माँ बाबा के खातिर  कभी भाई बहनोंके खातिर  कभी समाज के खातिर  तो कभी बच्चो के खातिर...

आज भी खड़ी हूँ

Jo Ho gayi main teri khud ko main kho chuki hoon  Sab kuch bhula ke tujhse mai is kadar judi hoon जो हो गयी मैं तेरी, खुद को मैं खो चुकी हूँ  सब कुछ भुला के तुझसे, मैं इस तरह जुडी हूँ  तेरे शहर की मिटटी, मुझसे ये कह रही  है इस नगर ये कूचे अब रहता नहीं है तू आएगा लौट के तू, मुझसे कभी तो मिलने मैं इंतज़ार करती, इस उम्मीद में रुकी  हूँ तेरी गली से होके, जो मोड़ जा रहा है उस मोड़ के किनारे मैं आज भी खड़ी हूँ यूँ तो सुनी थी मैंने सौ प्यार की कहानी जो होगयी दीवानी,किस्सा मैं खुद बनी हूँ  और, न रह गयी अधूरी, न हो  सकी मैं पूरी  बस तेरी कहानी की मैं, इक टूटी हुई कड़ी हूँ उस मोड़ के किनारे मैं आज भी खड़ी हूँ..  ~kavitaNidhi

क्यों चला गया

पंछी आये, बैठे, चहके और उड़ गए  वो शज़र था, जो बाहें फैलाये खड़ा रहा  मुसाफिर थके, ठहरे और फिर गुजर गए  ये मंज़िलों का रास्ता था, जो जमी पे पड़ा रहा  लहरे आयी, खेली और छू कर पलट गयी  प्यासा रेतीला साहिल, नम हो कर भी बिछा रहा  वो पले, बढ़े, जिए और फिर चले गए  बूढा घर राह तकता, झुका झुका सा टिका रहा  कितने बने, कितने बिगड़े और कितने खो गए  ये दुनिया का मेला बा-दस्तूर लगा रहा  जाना प्रकृति है, नियति हैं, फिर सवाल क्यों,  सवाल ये पूछो, कि जो रुका वो क्यों रुका रहा  मत पूछ वो आखिर क्यों चला गया ,तय था,  सवाल ये करो की जो रुका वो क्यों रुका रहा Sawal ye hai ki jobrooka BI kyo roka raha  चला गया, पर जो रुका, क्यों रुका रहा 

कामकाजी माँ और उसके हिस्से का रविवार

ज़िन्दगी से लड़ कर जब जीत के  थकी हुई शाम को घर आती है  इंतज़ार में बैठे बच्चे का मायूस  चेहरा देख कर फिर हार जाती है  एक कामकाजी माँ हर शाम यूँ ही घर आती है  थकान कुछ और बढ़ जाती है  फिर भी हिम्मत थोड़ी जुटती है  बदन दर्द हो तो भी कमर कस  फिर से काम  में जुट जाती हैं  एक कामकाजी माँ शाम घर में यूँ ही बिताती है  नहीं भूलती बच्चो की सारी फरमाइशें  थकी है वो ये कहाँ किसी से कह पाती है  पिछली रात उससे किये सारे वादे  याद रखती है, बड़े जतन से निभाती  हैं एक कामकाजी माँ  थक के भी यूँ मुस्कुराती है  वो हर दिन सुबह सवेरे काम पे जाती है  और हर शाम काम पे ही घर आती है  बखूबी मैनेज करती है ऑफिस घर और परिवार  पर कभी मिलता है उसे उसके हिस्से का रविवार? एक कामकाजी माँ काम में ही अपना रविवार बिताती  है