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चादर

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मिल से निकला हुआ कपडे का टुकड़ा धागो से बुन कर बना कपड़े का टुकड़ा   जब सेज पर बिछती  है तो कहलाती है चादर वो नायक नायिका के प्रेम कि साक्षी उस मद भरी रात की हमराज बनती है चादर आपनी सिलवटो से रात का अफसाना यूँहीं मंद मंद मुस्कुरा बयां करती है चादर उन स्पर्शो कि छाप  खुद पे  लिए हुए एक बार फिर से सेज बनती है चादर यूं समझो तो बहुत सी यादे है चादर वरना  क्या है! मिल  से निकला हुआ कपड़े का टुकड़ा धागो से बुन कर बना कपड़े का टुकड़ा विरहा के दिनों में नायिका की प्रीत की रात की याद होती है चादर, वो चादर ही  तो है जो खेलता है , नायिका के तन पे बन के आँचल  वो चादर ही सजी है दुल्हन पे  चुनरी  लाल बनके, वो चादर हि तो है जिसमे माँ  दूध पिलाती है बच्चे को छिपाकर  देखो उस बेबस गरीब लड़की को  जो...

झील और झरना

प्यार बना है झरना मेरा झील रही    उसकी चाहत पर                                       ठंडी सर्द हवाओं मैं जब                      कांप रही मेरी धड़कन जब                      ख़ामोशी की चादर ओढ़े,                      खड़ी रही उसकी चाहत पर लहरों के उन उफानो में जब मैं    बहती हूँ हर पल संयम का आँचल थामे तब चलता वो गीले साहिल पर                             ...

ग़ज़ल..... जाने वालो से

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जाने वालो से यूँ दिल नही मैला करते  थे जो कभी अपने उनसे नहीं रूठा करते इतनी बातो में कुछ मीठी सी यादे भी तो हैं सुलगी चिंगारियों से दिल नही रोशन करते जिन्दगी का ये सफर एक राह हम साथ चले आशना थे जो कभी उनको नहीं तगाफुल करते  यादों को सहेजे रखना तो अलग बात है मगर बीते उन लम्हों  मॆं फ़साने  नही खोजा करतें.. गिले तो वक्त को भी हम से कुछ रहें होंगें  गुजरे हुए वक्त से नही इस कदर शिकवे करतें… अब जो बिछुड़े हैं  तो के मुलाकात भी ना हो अलविदा कहके यूँ मुँह नही मोड़ा करतें… जाने वालो से यूँ दिल नही मैला करते ….

वो प्यारी सुबह

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  सूरज की आखों मॆं पड़ती किरने अलसाये बिस्तर पर सिकुड़ी सी चादर सुबह सवेरे, कानो मॆं पड़ती माँ की आवाज अखबार वाले की दरवाजे पर दस्तक, भाई का मुझको आ कर जगाना, स्कूल की टाई की नोट लगवाना, उठते ही माँ का ये कहना, जमीन पे पाव मत रखना, सर्दी लग जायेगी तुमको, दिल मॆं भरे प्यार का इशारा, सोकर उठ कर पापा की गोदी मॆं सर रखे आंखें मूंदे, कुछ  क्षण  यूही लेटे रहना कितनी प्यारी थी वो सुबह, सुबह तो आज भी हुई है, सूरज भी निकला होगा, माँ भी जागी होंगी, शायद दिल मॆं उसके मेरी तबियत की चिन्ता भी होगी भाई आज भी टाई बाँधता होगा, अखबार आज भी आया होगा, पापा आज भी बैंठें होंगे, सोचते की मैं कब फिर आ कर उस गोदी मॆं सर रखूँगी, यहाँ बहुत दूर, मैं तन्हा सोचती हूँ, एक दिन फिर लौट जाऊंगी घर जा कर अपने बचपन मॆं फिर से , जहाँ पापा, माँ, भाई सब होंगे, इस दौड़ती भागती दुनिया से दूर, माँ की छाव मॆं, पापा की गोदी मॆं, उस प्यार से भरे संसार मॆं, लगता है इन कुछ सालो मॆं, सदिया पा...

आवाज़

आवाज़ उसमें गीत है, उसमें झंकार और है किसी मॆं एक सधा फनकार मुझमें क्या है? सोचती हूँ हर बार मुझमें हूंक है, मुझमें है आवाज वो आवाज़ जो आती है दिल से और लेती है शब्दो का आकार वाक्य बनकर, भावनाओं मैं ढल कर बदल सकती है ये संसार ......... यारों! सुनो मेरी एक बात तुम भी अगर सुन पाओ अपने इस दिल की आवाज़ कर पाओगे तुम भी अपना हर सपना साकार …. उठो , फिर क्यो है? ये अनभिज्ञता ख़ुद से पहचानो अपने वो ख्वाब आओ …. और आज दे ही दो अपने दिल की आवाज़ को आवाज़ अपने दिल की, आवाज़ को आवाज़.

मन मेरा बेचैन है

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मन मेरा बेचैन  है, या ऋतुओ  का फेर है। ठण्डी सी हवाए क्यों लगती है वज्र सी, लेती इम्तेहान मेरा हर घड़ी सब्र की। हर लम्हा रुक गया है, बैठा है पास मे, आयेंगे पिया मेरे, है ऐसी ही आस मे। इतना समझाया इसे, आभी कुछ तो देर है , मन मेरा बेचैन है, या ऋतुओं का फेर है। बारिश की बूंदे यूँ, मन को छू रही है क्यों, बैठी  हूँ दूर फिर भी तन भिगो रही है क्यों। पत्तों की सरसराहट हर तरफ है गूंजती, कदमो की हर आहात, कानो से पूंछती। दृश्य मैं हो तुम ही तुम, ये आँखों का हेर है, मन मेरा बेचैन है या ऋतुओं का फेर है। आभी तक महसूसती हूँ उंगलियों की छाप जो, पिंघल के कुछ उड़ गया है, तन मेरा है भाप जो। कमरे के कोने में चादर को ओढ़ के , बैठी समेट के और पैरों को मोड़ के। सन्नाटा छाया है, ख्वाबों का घेर है , मन मेरा बेचैन है या ऋतुओं का फेर है।

चली ससुराल

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     चली ससुराल     चाहतों की डोली मे, ख्वाहिशे चढ़ा कर, ख्वाबों की दुल्हन को प्यार से सजा कर। रिश्तो के नए पहलू, से की सगाई,  बाबुल ने घर से जो दी है बिदाई। बंधन जनम का मैं छोड़ वहाँ आई, जन्मों का बंधन मैं बाँध के हूँ आई। माँ ने निभाए जो रस्मो रिवाज, आँचल के कोने से बंधे है आज। पापा ने दी हैं दुआएं हज़ार, भाई ने पोटली भर रखा है प्यार। एक नयी रहा खुली कदमों के सामने, आये है हाथ मेरा सजन जी थामने। दिखती ससुर मैं है पापा की ही झलक, नाम है नया,नहीं रिश्ता ये कुछ अलग।                                                      बहनों की जो कमी मैं अब तक महसूसती थी, देकर सहयोग आपना, ननदों ने दूर की। देवर मिले मुझे है भाई से बढ़ कर, करेंगे...