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Showing posts from September, 2024

तूफ़ान उठना चाहिए

सीने की इस आग से सूरज पिंघलना चाहिए दिल में जज़्बा है अगर तूफ़ान उठना चाहिए चिंगारियों से अब सुनो,  होगा कुछ हासिल नहीं जोश का इस दिल में अब शोला भड़कना चाहिंए रात काली इतनी लम्बी चाँद भी डूबा लगे रातों को अब चीर कर सूरज निकलना चाहिए  और कितनी है सजा अब, ये बता मुझको खुदा  इंसान तो इंसान है, तुझको समझना चाहिए सौ दिशा में दौड़ें जो, भीड़ से हो जायेंगे है जीतना, तो हर कदम, साथ  उठना चाहियें  क्रोध भी अब कब तलक, यूँ धैर्य का पर्वत रहे बन के एक ज्वालामुखी, लावा निकलना चाहिए इस पवन के कान में  तू , फूक दे कुछ यूँ निधि  आसमा आल्हाद से फिर , गूंज उठना चाहिए  —————Ok 

इश्क़ होना चाहिए

  ————- इश्क़ की गलियों में दिल बदनाम  होना  चाहिए आशिक़ो में अब तो मेरा नाम होना चाहिए  प्यार के एहसास का बस इस तरह इज़हार हो कुछ  कहो या न कहो, महसूस होना चाहिए जान भी देदूं मैं अपनी आशिकी में अब सनम इश्क़ में मजनू सा एक, महबूब होना चाहिए तेरी  ख़ुशी के वास्ते, हैं ज़ख्म कितने ये लियें अश्क़ तो पिलएंगे हम, तू खुश भी  होना  चाहिए मैं लुटादूँ  तुझपे अपनी ज़िन्दगी की हर ख़ुशी चहरे सा मासूम तेरा दिल भी होना चाहिए है नहीं काफी ये कहना, इश्क़ हमको है बहुत हैं अगर जज़्बात दिल में, दर्द होना चाहिए  प्यार में तड़पन है कितनी, तुम न समझोगे अभी  मुझसा ही अब, तुझको मुझसे इश्क़ होना चाहिए  क्या करोगी इश्क़ की उस आग में जल के निधि  उसको भी तो वो जमाना याद होना चाहिए  ————-

दिल के जज़्बात

मेरे दिलऐ जज़्बात   बड़ी मुश्किल से बिठाये  हैं  बहर में  , मेरे दिलऐ जज़्बात  जाते हैं  बाहेर फिर भी  निकल  ये, मेरे दिलऐ जज़्बात    वैसे भी ये शर्ते कहाँ मानी कभी जामने की इसने   अपने ही दिल के तो मालिक है ये, मेरे  दिलऐ जज़्बात  थोड़े  उन्मुक्त  से हैं ये, बड़े उद्दंड और  उच्छंद  से हैं बिना किसी छंद निकल आते हैं ये, मेरे  दिलऐ जज़्बात  कितना समझाया इन्हे , काफिया में रहें,  ये रदीफ कहें  सुन बगावत पे उतर आते हैं ये, मेरे  दिलऐ जज़्बात  लिखते हम भी, कुछ तो शायरी,  कोई अच्छी सी गजल  गर सलीके से निकलते जरा ये, मेरे  दिलऐ जज़्बात  मैंने तो सोच लिया था मेरा एक  तख़ल्लुस  भी निधि  आके मक़्ते पे यूँ बिखरते न जो   ये, मेरे  दिलऐ जज़्बात  ~kavitaNidhi ——/////

पुरानी हूं मैं

पुरानी हूं मैं  बस एक लहर नहीं  हूं मैं ,  मौजो की रवानी हूं मैं  छोटा सा वाकया नहीं,एक पूरी कहानी हूं मैं  जितना जानते हो मुझे, बस उतना काफी नहीं  है  जितनी दिखती हूँ  उससे, थोड़ा ज्यादा स्यानी हूँ मैं  चार पन्ने पढ़ किताब के, भला कैसे समझ लोगे तुम?  रामायण,  महाभारत  पढ़ी है? वैसी, कोई पोथी पुरानी हूं मैं   वो सोचते है कि  उनसे,  प्यार  करती हूं मैं बहुत  नापोगे  तो जानोगे,  कि पूरी दीवानी हूं मैं ना चार दिन की चांदनी,और ना एक रात सुहानी  ज़िन्दगी का एक हिस्सा नहीं,  एक  पूरी ज़िंदगानी हूँ मैं  आजकल सा प्यार नहीं, कद्रदान हूं, निधि उस इश्क की   दिखती हूँ नई पर दिल से, कई पीढ़ी पुरानी हूं मैं ~KavitaNidhi ———-

रिश्ते

  कुछ रिश्ते ना टूटे हैं ना आवाज़ करते हैं   बस वक़्त के गर्त में खामोशी से खो जाते  हैं  कभी जो ज़िन्दगी से बढ़ कर  हुआ करते थे  कैसे इस कदर हमसे अजनबी से  हो जाते है 

जिद्द

                    जिद्द ————————————————— हमसफ़र बनके हार, साथ निभाती है रही  मैं सीखती रही ये जो भी सिखाती हैं  रही  टूट के बिखरी तो थी मैं भी,कई बार मगर  मेरी उम्मीद थी जो जोश  बढाती ही रही  चाँद ने लूटी थी जब मेरे सितारों की चमक  आस के जुगनू लिए, रात काटी सुबह तलक  पेँच किस्मत की पतंग ने लड़ायें थे जो जरा  डोर मैं सब्र की हाथो में बस थामे ही रही  ~ kavitaNidhi तेज तूफानों ने जो वार कई बार किये  मैंने टूटी हुई कश्ती में हाथ पतवार किये  कभी जो पैर मेरे डगमगाए से थे जरा  मेरी नज़रे मगर साहिल के उस पार रहीं  जो भी लिखती रही मैं गीले इस साहिल पे  उसे मिटा गयी हर बार आके ये लहरें  मैंने सीखा हैं इन्ही लहरों से  जिद्द  करना मगर  घरोंदे रेंत के, ये गिरती, मैं बनाती ही रही  मैं सीखती रही ये जो भी सिखाती हैं  रही.....  हमसफ़र बनके...

चाय

चाय सिर्फ चाय नहीं, एक बहाना है यारो के साथ बैठे दिल की बात सांझा करने का  भागती जिंदगी मैं थोड़ा रुक सकून की सांस लेने का  कुछ घड़ी ख्वाइशों और ख्वाबो में खो जाने का गिरती बारिश में दूर से ही बैठे बैठे भीगने का  बीती बिछड़ी यादों में थोड़ा और गहरा डूबने का हर चुस्की के साथ जिंदगी और ज़्यादा महसूसने का  दोस्तों,  ये  सिर्फ चाय नहीं एक बहाना है फिर चलने से पहले, कुछ ठहरने और संभलने का  बाहर का शोर छोड़, अपने भीतर झाँकने का तुमसे दिल ही दिल में दो चार बातें करने का  बहाना है,खूबसूरत जिंदगी को खामोशी से सराहने का  चाय के धुए से कुछ खुशबू और गर्मी चुराने का  और कितने अनमोल हैं ये पल, खुद को बताने का  चाय सिर्फ चाय नहीं, एक बहाना है  ये कहने का  कि  ज़िन्दगी ठहर जरा, मुझे कुछ और जीने दे  कुछ और अपनी मीठी गर्म चुस्किया लेने दे  हाथो से फिसलने से पहले मेरी सांसे छूने दे  चल पडूंगा उस रास्तें  पे जहाँ तू ले चलेगी  बस एक पल को इसी मोड़ पे खड़ा रहने दे  जो जैसा है उसे कुछ और देर वहीँ थमा रहने दे ...